मंडी पंचायत चुनाव: रातों-रात गायब हुए पुल और भवन, फेसबुक पोस्ट्स से प्रधानों का बीपी हाई, जानें पूरा घोटाला!
Mandi News: हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में पंचायत चुनावों का बिगुल बजते ही कुछ सफेदपोश नेताओं की नींद और चैन दोनों उड़ गए हैं। अगर आपको लगता है कि महान जादूगर सिर्फ स्टेज पर ही गायब करने का करतब दिखाते हैं, तो आपको मंडी जिले की कुछ पंचायतों का दौरा करना चाहिए। यहाँ के कुछ 'जादूगर प्रधानों' ने कागजों पर बने पुल, शमशान घाट के शेड और लाखों-करोड़ों के सामुदायिक भवन हवा में गायब कर दिए हैं। अब चुनाव सिर पर हैं, तो एक शख्स ने फेसबुक पर ऐसे-ऐसे बम फोड़ने शुरू कर दिए हैं कि इलाके के भ्रष्टाचारियों को चुनाव लड़ने से पहले अपना ब्लड प्रेशर और शुगर चेक करवाना पड़ रहा है। आइए, इस मजेदार लेकिन बेहद चौंकाने वाले चुनावी घोटाले की पूरी कहानी विस्तार से जानते हैं।
Overview:
मंडी जिले के गोहर ब्लॉक (नाचन विधानसभा) की कई पंचायतों—जैसे चैल चौक, नौण, शाला आदि—में भ्रष्टाचार के बड़े मामले सामने आए हैं। सुरेश कुमार नामक एक स्थानीय व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर दस्तावेजों और तस्वीरों के साथ प्रधानों, वार्ड सदस्यों और विधायकों की पोल खोल दी है। आलम यह है कि जो प्रधान करोड़ों डकार गए, उन्हें अब खुली चेतावनी दी जा रही है कि वे घर बैठ जाएं, वरना उनकी धज्जियां उड़नी तय हैं। यह लेख इसी भ्रष्टाचार रूपी 'कॉमेडी शो' और जनता के पैसों की लूट का विस्तृत पर्दाफाश है।
भ्रष्टाचार का ऐसा 'डाइट प्लान' जो आपको हैरान कर देगा
आमतौर पर डॉक्टर सेहतमंद रहने के लिए हरी सब्जियां और फल खाने की सलाह देते हैं, लेकिन मंडी जिले के कुछ पंचायत प्रतिनिधियों का 'डाइट प्लान' बिल्कुल अलग है। इन्हें ईंट, सीमेंट, लोहे के सरिए और सरकारी फाइलों से बना खाना पचता है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पोस्ट्स के अनुसार, पंचायत प्रतिनिधियों की भूख इतनी ज्यादा थी कि वे विकास कार्यों का पूरा का पूरा ढांचा ही निगल गए।
327 डंगे (Retaining Walls) और 36 करोड़ का घोटाला
सुरेश कुमार की एक पोस्ट के अनुसार, एक कांग्रेसी प्रधान की भूख इतनी विशाल थी कि वह पंचायत के 327 'डंगे' (सुरक्षा दीवारें) खा गया। बताया जा रहा है कि इस पूरे खेल में 36 करोड़ रुपये का गबन हुआ। अब सवाल यह उठता है कि क्या मंडी में कोई ऐसा हाजमे का चूर्ण मिलता है जिससे 36 करोड़ का कंक्रीट हजम हो जाए? मजे की बात यह है कि इस महाघोटाले पर किसी ने आवाज तक नहीं उठाई। अब जब चुनाव सामने हैं, तो सवाल पूछा जा रहा है कि क्या ऐसे लोगों को दोबारा सत्ता सौंपनी चाहिए?
शमशान घाट का शेड भी नहीं छोड़ा
इंसान दुनिया से जाते वक्त शमशान घाट जाता है, लेकिन कुछ नेताओं ने तो शमशान घाट को ही शमशान बना दिया। एक पोस्ट में सीधा तंज कसा गया है कि जब एक वार्ड मेंबर (सोहन) शमशान घाट का शेड खा गया, तब आज बड़े-बड़े आदर्शों की बात करने वाले और प्रधान पद के उम्मीदवार कहां छिपे बैठे थे? जनता के लिए यह किसी कॉमेडी से कम नहीं है कि मरने के बाद भी इंसान को धूप और बारिश से बचाने वाला शेड किसी नेता के पेट में जा चुका है।
कागजों पर बने महल: 'गायब' होने वाले सामुदायिक भवन
भ्रष्टाचार का सबसे क्लासिक तरीका है—पैसे निकालो, कागजों पर इमारत खड़ी करो और असलियत में वहां घास उगने दो। चैल चौक पंचायत के कोहलू गांव में ठीक ऐसा ही हुआ है।
- तीन सामुदायिक भवन गायब: कागजों के अनुसार कोहलू वार्ड में 3-3 सामुदायिक भवन बने हुए हैं। लेकिन अगर आप धरातल पर जाकर ढूंढेंगे, तो आपको वहां एक ईंट भी नहीं मिलेगी।
- नेताओं की रिश्तेदारी और चुप्पी: आरोप है कि डॉली चौहान नाम की एक नेत्री, जो भाजपा महिला मोर्चा की पदाधिकारी भी हैं, ने कभी इस भ्रष्टाचार पर मुंह नहीं खोला और अब वे खुद प्रधान बनना चाहती हैं। जनता से पूछा जा रहा है कि जो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल सकती, उसे वोट क्यों दें?
- विधायक का कनेक्शन: स्थानीय विधायक (MLA) विनोद पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। उन्होंने आज तक इस भ्रष्टाचार पर कुछ नहीं कहा। दिलचस्प बात यह है कि जिस कोहलू गांव से तीन भवन गायब हुए हैं, उसी गांव से विधायक की दो रिश्तेदार प्रधान पद के लिए चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रही हैं।
मुख्यमंत्री लोक भवन का 'महान' घोटाला
चैल चौक पंचायत में विकास के नाम पर एक और बड़ा कारनामा हुआ है। यहां 92 लाख रुपये की लागत से 'मुख्यमंत्री लोक भवन' बनाया गया। लेकिन इसके पीछे की कहानी किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है।
आरोप है कि इस 92 लाख के भवन की आड़ में पुराने सामुदायिक भवन, सीएससी भवन और पंचायत सम्मेलन कक्ष का वजूद ही मिटा दिया गया। बात यहीं खत्म नहीं होती, सबसे बड़ा चुटकुला तो यह है कि यह विशाल भवन वन विभाग (Forest Department) की जमीन पर तान दिया गया! क्या किसी अधिकारी को यह नजर नहीं आया? या फिर 'अंधेर नगरी, चौपट राजा' वाली कहावत यहां पूरी तरह से चरितार्थ हो रही है?
गरीबी रेखा (IRDP/BPL) का अमीरों वाला मजाक
सरकारी योजनाएं गरीबों के उत्थान के लिए होती हैं, लेकिन गोहर ब्लॉक की पंचायतों में इसका इस्तेमाल रिश्तेदारों को सेट करने के लिए किया गया। ऐसे-ऐसे कारनामे सामने आए हैं जो किसी भी आम आदमी का खून खौलाने के लिए काफी हैं।
पति को गरीब बताकर लगाई सरकारी नौकरी
एक महिला प्रधान ने अपने ही पति का नाम IRDP (Integrated Rural Development Programme) यानी गरीबी रेखा की सूची में डाल दिया। इसके बाद उसी कोटे से पति को सरकारी नौकरी भी लगवा दी गई। जब पेट भर गया, तो अब वह प्रधानन महोदया फिर से चुनाव लड़ने आ गई हैं। सोशल मीडिया पर लोग हंस रहे हैं कि 'गरीबी हो तो ऐसी हो!'
करोड़ों का कारोबार, लेकिन नाम BPL में
नौण पंचायत में एक पंचायत वेंडर को कई सालों तक IRDP में रखा गया। जब ग्रामीणों ने भारी विरोध किया, तब जाकर उसका नाम काटा गया। कार्यवाही रजिस्टर के प्रमाण सोशल मीडिया पर डाल दिए गए हैं, जिसमें साफ लिखा है कि चार पहिया वाहन और आयकर दाता होने के बावजूद इस व्यक्ति को BPL में रखा गया था। डीसी मंडी और डीपीओ मंडी पर भी सवाल उठाए गए हैं कि करोड़ों का काम करने वालों को सरकारी लाभ देना क्या अपराध नहीं है?
'हवा में' पेंशन और डमी हाजिरी का खेल
पंचायत चुनावों में वोट पक्के करने के लिए प्रधानों ने नई तरकीबें खोजी हैं। एक पोस्ट में खुलासा किया गया है कि कुछ प्रधानों ने अपने उन समर्थकों की भी 'वृद्धावस्था पेंशन' लगा दी है, जिनकी उम्र 60 साल से कम है। वोट के लिए जवानी में ही लोगों को बूढ़ा बना दिया गया। जल्द ही इन नामों का भी पर्दाफाश होने वाला है।
इसके अलावा नरेगा और अन्य कार्यों में 'जाली हाजिरी' (Fake Attendance) लगाने वाले प्रधानों से भी सवाल पूछा गया है। 10 लाख रुपये से ज्यादा खर्च करके एक ही पुल और एक ही चेक डैम बार-बार कागजों में दिखाया गया। गूगल मैप की लोकेशन और महात्मा गांधी नरेगा के बोर्ड की तस्वीरें इस बात की गवाही दे रही हैं कि 10 लाख रुपये नाले में नहीं, बल्कि नेताओं की जेब में बहे हैं।
"हलवा समझा है क्या?" - सुरेश कुमार का खुला चैलेंज
भ्रष्टाचारियों की बखिया उधेड़ने वाले सुरेश कुमार ने अब सीधी चुनौती दे दी है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि "मेरे से भिड़कर चुनाव जीतोगे? हलवा समझा है क्या?" उन्होंने ऐसे भ्रष्ट नेताओं को चेतावनी दी है कि वे अगले एक महीने के लिए डॉक्टर हायर कर लें, क्योंकि उनके खुलासों से इन नेताओं का ब्लड प्रेशर और शुगर दोनों बढ़ने वाले हैं।
जो नेता इन पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें भी करारा जवाब मिला है—"जिसको लग रहा है मैं गलत लिख रहा हूं, वो मेरे खिलाफ कोर्ट जा सकता है। तुम्हारे कारण ही सही, मामले कोर्ट तो पहुंचे।" यह आत्मविश्वास दर्शाता है कि उनके पास कागजी सुबूत पूरे हैं और शाला पंचायत के भ्रष्टाचार के मामले तो पहले से ही हाई कोर्ट में चल रहे हैं। जात-पात और आरक्षण के नाम पर लड़ाने वाले इन नेताओं को 'पिशाच' करार दिया गया है, जिनसे जनता को दूर रहने की सलाह दी गई है।
निष्कर्ष (Conclusion)
मंडी जिले के गोहर ब्लॉक और नाचन विधानसभा क्षेत्र की इन पंचायतों का हाल देखकर एक बात स्पष्ट है—भ्रष्टाचार दीमक की तरह सिस्टम को खोखला कर रहा है। कागजों पर बनी इमारतें और हवा में गायब हुए पुल सिर्फ सरकारी खजाने की लूट नहीं, बल्कि आम जनता के हकों पर डाका हैं। ऐसे समय में जब पंचायत चुनाव नजदीक हैं, मतदाताओं को आंखें खोलकर वोट करना होगा। जो लोग दूसरों की बेटियों के रेप के लिए कमरे बुक करने वालों का समर्थन करते हैं या जो 10-10 लाख के पुल डकार जाते हैं, उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाना ही एकमात्र उपाय है। आपको क्या लगता है, क्या ऐसे प्रधानों पर विजिलेंस जांच बिठाई जानी चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। अगर आप भी मानते हैं कि भ्रष्टाचारियों का पर्दाफाश होना चाहिए, तो इस आर्टिकल को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और बेबाक खबरों के लिए हमें फॉलो करें!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: पंचायत चुनाव में सामुदायिक भवन के निर्माण में भ्रष्टाचार कैसे होता है?
उत्तर: भ्रष्ट प्रतिनिधि सरकारी फंड पास करवा लेते हैं, लेकिन धरातल पर निर्माण करने के बजाय कागजों में ही काम पूरा दिखाकर सारा पैसा खुद गबन कर जाते हैं।
प्रश्न 2: IRDP या BPL सूची में धांधली क्या होती है?
उत्तर: जब अमीर लोगों, आयकर दाताओं या पंचायत प्रतिनिधियों के रिश्तेदारों को अवैध रूप से गरीबी रेखा की सूची में डालकर सरकारी योजनाओं और नौकरियों का लाभ दिलाया जाता है, तो उसे BPL धांधली कहते हैं।
प्रश्न 3: पंचायत में 'जाली हाजिरी' (Fake Attendance) का क्या मतलब है?
उत्तर: मनरेगा या अन्य पंचायत कार्यों में उन लोगों के नाम पर काम की हाजिरी लगाना जो असल में वहां काम करने गए ही नहीं, और उनके नाम का पैसा प्रधान या ठेकेदार द्वारा निकाल लेना जाली हाजिरी कहलाता है।
प्रश्न 4: मंडी जिले की किन पंचायतों में भ्रष्टाचार के मामले हाईलाइट हुए हैं?
उत्तर: सोशल मीडिया के खुलासों के अनुसार, मंडी जिले के गोहर ब्लॉक की चैल चौक, नौण, शाला और कोहलू वार्ड जैसी पंचायतों में भारी भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं।
प्रश्न 5: क्या 60 साल से कम उम्र के व्यक्ति को वृद्धावस्था पेंशन मिल सकती है?
उत्तर: बिल्कुल नहीं, वृद्धावस्था पेंशन के लिए सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम आयु सीमा (आमतौर पर 60 वर्ष) का होना अनिवार्य है। कम उम्र में पेंशन लगाना कानूनी अपराध है।
प्रश्न 6: डंगा (Retaining Wall) घोटाला क्या है?
उत्तर: पहाड़ों में भूस्खलन रोकने के लिए डंगे लगाए जाते हैं। इसमें भ्रष्टाचार तब होता है जब डंगे बनाए ही न जाएं या बेहद घटिया सामग्री से बनाकर भारी-भरकम बिल पास करवा लिए जाएं।
प्रश्न 7: क्या किसी नेता के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत आम नागरिक कर सकता है?
उत्तर: हां, कोई भी नागरिक पुख्ता सबूतों के साथ सीएम हेल्पलाइन, विजिलेंस विभाग या पंचायती राज विभाग के उच्चाधिकारियों से लिखित शिकायत कर सकता है।
प्रश्न 8: मुख्यमंत्री लोक भवन को वन विभाग की जमीन पर बनाना क्यों गलत है?
उत्तर: बिना वन विभाग (Forest Department) की मंजूरी और क्लीयरेंस (FCA) के वन भूमि पर कोई भी पक्का निर्माण करना पूरी तरह से गैरकानूनी है।
प्रश्न 9: अगर कोई प्रधान भ्रष्टाचार करता है, तो जनता क्या कर सकती है?
उत्तर: जनता आरटीआई (RTI) लगाकर कार्यों का ब्यौरा मांग सकती है, शिकायत दर्ज कर सकती है और सबसे महत्वपूर्ण, आगामी चुनावों में ऐसे उम्मीदवार को वोट न देकर उसे हरा सकती है।
प्रश्न 10: क्या सोशल मीडिया पोस्ट्स को कोर्ट में सबूत माना जा सकता है?
उत्तर: सोशल मीडिया पोस्ट्स को सीधे तौर पर सबूत नहीं माना जाता, लेकिन यदि उनके साथ संलग्न सरकारी दस्तावेज, आरटीआई कॉपी और रजिस्टर की प्रमाणित तस्वीरें हों, तो वे जांच का आधार जरूर बन सकते है