भरण-पोषण का अधिकार क्या है? पत्नी, बच्चों और माता-पिता के लिए BNSS कानून के नए नियम और पूरी प्रक्रिया

जानिए नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत भरण-पोषण (Maintenance) के नियम, पात्रता और कोर्ट से हक पाने की पूरी कानूनी प्रक्रिया।

Family Rights: भारत का कानून यह सुनिश्चित करता है कि समाज का कोई भी आश्रित व्यक्ति आर्थिक अभाव या तंगी में न रहे। यदि कोई व्यक्ति सक्षम होने के बावजूद अपनी पत्नी, बच्चों या बूढ़े माता-पिता की देखभाल नहीं करता है, तो कानून पीड़ितों को गरिमा के साथ जीने और गुजारा भत्ता (Maintenance) पाने का पक्का अधिकार देता है। 1 जुलाई 2024 से लागू हुए नए आपराधिक कानून—भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)—के तहत भरण-पोषण की प्रक्रिया को और अधिक तीव्र व पारदर्शी बनाया गया है। यह ब्लॉग आपको आसान भाषा में समझाएगा कि भरण-पोषण का अधिकार क्या है, इसके हकदार कौन हैं और आप इसके लिए कोर्ट में कैसे आवेदन कर सकते हैं।

right-of-maintenance-law
right-of-maintenance-law

भरण-पोषण का अधिकार क्या है और यह क्यों जरूरी है?

साधारण शब्दों में कहें तो भरण-पोषण (Maintenance) वह कानूनी वित्तीय सहायता है, जो किसी आश्रित व्यक्ति को भोजन, कपड़े, मकान, शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कोर्ट के आदेश द्वारा दिलाई जाती है। यह अधिकार सुनिश्चित करता है कि समाज में कमजोर या आश्रित लोग आर्थिक अभाव में न रहें और उन्हें दर-दर भटकने पर मजबूर न होना पड़े।

भरण-पोषण का मूल उद्देश्य आश्रितों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देना है। पुराने कानून में यह व्यवस्था दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत संचालित होती थी। लेकिन अब इसे नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के अंतर्गत लाया गया है, जिसमें महिलाओं और बुजुर्गों के मामलों की त्वरित सुनवाई के विशेष नियम शामिल किए गए हैं।

यह कानून पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष (Secular) माना जाता है, जिसका अर्थ है कि देश का कोई भी नागरिक चाहे वह किसी भी धर्म का हो, इस धारा के तहत अपने अधिकारों की मांग कर सकता है। कोर्ट ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष की गुहार पर बहुत ही संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेता है ताकि आश्रितों को तुरंत राहत मिल सके। आइए अब विस्तार से जानते हैं कि कानून के अनुसार यह अधिकार किन-किन लोगों को मिल सकता है।

संक्षेप में समझें: भरण-पोषण का अधिकार एक सामाजिक-कानूनी सुरक्षा कवच है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी आश्रित व्यक्ति आर्थिक तंगी का शिकार न हो। सक्षम व्यक्ति द्वारा उपेक्षा किए जाने पर पीड़ित सीधे कोर्ट से मासिक गुजारे भत्ते की मांग कर सकते हैं।

लैंडमार्क जजमेंट या केस स्टडी (Landmark Judgment / Case Study)

भरण-पोषण के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का 'रजनीश बनाम नेहा' का फैसला पूरे देश की पारिवारिक अदालतों के लिए एक ऐतिहासिक मार्गदर्शिका है। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कड़े नियम तय किए थे कि याचिका दायर होने की तिथि (Date of Application) से ही पीड़ित को अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) मिलना शुरू होना चाहिए। इसके अलावा, कोर्ट ने पति और पत्नी दोनों के लिए अपनी संपत्ति और आय का विस्तृत हलफनामा (Affidavit of Assets and Liabilities) देना अनिवार्य कर दिया है ताकि कोई भी अपनी असली कमाई कोर्ट से छिपा न सके।

काल्पनिक और व्यावहारिक उदाहरण: मान लीजिए 'किरण' का विवाह 'राकेश' से हुआ था। कुछ समय बाद राकेश ने बिना किसी वैध कारण के किरण और उनकी 5 साल की बेटी को घर से निकाल दिया। किरण के पास अपनी आजीविका का कोई साधन नहीं था। किरण ने तुरंत फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण की अर्जी लगाई। कोर्ट ने राकेश की आय की जांच की और किरण व उसकी बेटी के लिए हर महीने ₹15,000 की अंतरिम राशि तय कर दी। इसके कारण किरण और उसकी बेटी को कानूनी सुरक्षा मिली और वे अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में सक्षम हो सके।

किन लोगों को भरण-पोषण पाने का कानूनी अधिकार है? (Eligibility)

भारत का कानून समाज के सभी कमजोर और आश्रित वर्गों की सुरक्षा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन श्रेणियों के लोगों को भरण-पोषण पाने का अधिकार हो सकता है:

  • पत्नी (Wife): यदि पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में पूरी तरह असमर्थ है, तो वह अपने पति से गुजारा भत्ता मांग सकती है। इसमें कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के साथ-साथ कुछ मामलों में तलाकशुदा पत्नियां भी शामिल हैं, बशर्ते उन्होंने दूसरी शादी न की हो।
  • बच्चे (Children): सभी नाबालिग बच्चे (चाहे वह लड़का हो या लड़की, जायज हो या नाजायज) अपने पिता से खर्च पाने के हकदार हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ विशेष परिस्थितियों में वयस्क दिव्यांग बच्चे (Mentally or Physically Disabled Adult Children) भी इस अधिकार के दायरे में आते हैं।
  • माता-पिता (Parents): वृद्ध या लाचार माता-पिता, यदि वे स्वयं अपना खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं, तो वे अपनी संतान (बेटे या बेटी) से मासिक गुजारा भत्ता पाने का पूरा कानूनी अधिकार रखते हैं।

भरण-पोषण की मांग कब की जा सकती है? (When to Claim?)

गुजारा भत्ता मांगने के लिए परिस्थितियों का न्यायसंगत होना अनिवार्य है। भरण-पोषण का दावा निम्नलिखित परिस्थितियों में उत्पन्न होने पर किया जा सकता है:

  • पति-पत्नी के अलग रहने की स्थिति में: यदि पति-पत्नी के बीच गंभीर मतभेद हैं और वे किसी वैध कारण (जैसे क्रूरता या छोड़ देना) से अलग रह रहे हैं।
  • तलाक के बाद: यदि पति-पत्नी का कानूनी रूप से तलाक हो चुका है और कानून के अनुसार पत्नी पात्रता की सभी शर्तें पूरी करती है।
  • पति द्वारा खर्च का उचित प्रबंध न करने पर: जब पति सक्षम होने के बावजूद जानबूझकर अपनी पत्नी और बच्चों के दैनिक खर्च की उपेक्षा करता है या उचित प्रबंध नहीं करता।
  • वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा होने पर: जब कमाऊ बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता की बुनियादी जरूरतों, भोजन और दवाइयों के खर्च को उठाने से साफ मुकर जाते हैं या उनकी घोर उपेक्षा करते हैं।

न्यायालय भरण-पोषण की राशि तय करते समय किन बातों पर विचार करता है?

कई लोग सोचते हैं कि गुजारा भत्ते की कोई एक निश्चित या फिक्स रकम होती है, लेकिन कानूनन ऐसा बिल्कुल नहीं है। भरण-पोषण की राशि प्रत्येक मामले के तथ्यों, आय, खर्च और परिस्थितियों के आधार पर न्यायालय स्वयं तय करता है। इसकी कोई एक निश्चित राशि तय नहीं होती है। मुख्य रूप से अदालत इन 4 बिंदुओं पर गहन विचार करती है:

  • दोनों पक्षों की आय और आर्थिक स्थिति: पति/संतान की कुल मासिक कमाई, उनकी संपत्ति और इसके मुकाबले पीड़ित पक्ष (आवेदक) की वित्तीय स्थिति क्या है।
  • आवेदक की आवश्यकताएँ: पीड़ित पक्ष को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए भोजन, कपड़े और सम्मानजनक निवास के लिए कितनी न्यूनतम राशि की जरूरत है।
  • बच्चों की शिक्षा और चिकित्सा का खर्च: यदि आश्रितों में स्कूल जाने वाले बच्चे या बीमार बुजुर्ग शामिल हैं, तो उनकी पढ़ाई-लिखाई और नियमित दवाइयों के खर्च को विशेष तरजीह दी जाती है।
  • जीवन स्तर और अन्य परिस्थितियां: शादी के दौरान या घर पर रहते समय महिला या माता-पिता का जो जीवन स्तर (Standard of Living) था, कोर्ट उसे बनाए रखने का पूरा प्रयास करता है।

भरण-पोषण के लिए आवेदन कहाँ और कैसे करें (Step-by-step Guide)

यदि आप अपने भरण-पोषण का कानूनी दावा पेश करना चाहते हैं, तो संबंधित पारिवारिक न्यायालय (Family Court) या कानून के अनुसार सक्षम न्यायालय में आवेदन किया जा सकता है। तुरंत इन व्यावहारिक चरणों का पालन करें:

  • Step 1: पारिवारिक कोर्ट के वकील से मिलें: अपने क्षेत्र के किसी अच्छे फैमिली कोर्ट के वकील (Family Lawyer) से संपर्क करें और उन्हें अपनी वास्तविक आर्थिक स्थिति व विपक्षी की आय के स्रोतों के बारे में पूरी जानकारी दें।
  • Step 2: आवश्यक दस्तावेज और अर्जी तैयार करें: नए कानून BNSS की सुसंगत धाराओं के तहत आवेदन पत्र ड्राफ्ट करवाएं। इसके साथ अपना आधार कार्ड, विवाह का प्रमाण (यदि पत्नी हैं), बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र या माता-पिता के चिकित्सा बिल संलग्न करें।
  • Step 3: अंतरिम भरण-पोषण की मांग करें: मुख्य केस का फैसला आने में समय लग सकता है, इसलिए वकील के माध्यम से पहली ही सुनवाई पर 'अंतरिम भरण-पोषण' (Interim Maintenance) की गुहार लगाएं ताकि कोर्ट केस चलने के दौरान भी आपको हर महीने पैसे मिलते रहें।
लीगल प्रो टिप (Legal Pro Tip): यदि विपक्षी (पति या बेटा) अपनी असली आय छुपाने के लिए कोर्ट में झूठा हलफनामा देता है, तो आप बैंक स्टेटमेंट, उनकी गाड़ी के कागजात या सोशल मीडिया पर उनकी महंगी यात्राओं के फोटो कोर्ट के सामने साक्ष्य के रूप में पेश कर सकते हैं। नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के तहत यह डिजिटल साक्ष्य उनके झूठ को पकड़ने में बेहद मददगार होता है।

लोग अक्सर ये गलतियां करते हैं (Common Mistakes to Avoid)

  • बिना किसी कारण के मायके बैठ जाना: यदि पत्नी बिना किसी ठोस और उचित वजह के (अपनी मर्जी से) पति का घर छोड़कर अलग रहने लगती है, तो कानून के अनुसार वह भरण-पोषण पाने का अधिकार खो सकती है। अलग रहने की वैध वजह कोर्ट को जरूर बताएं।
  • आय के झूठे दावे करना: विपक्षी की आय को बिना किसी प्रमाण के अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर बताना आपके केस को संदिग्ध बना सकता है। हमेशा तथ्यात्मक जानकारी ही कोर्ट के सामने रखें।
  • न्यायालय के आदेश के बाद ढिलाई बरतना: यदि कोर्ट ने गुजारा भत्ते का आदेश दे दिया है और विपक्षी समय पर पैसे नहीं दे रहा है, तो लोग महीनों चुप रहते हैं। आपको तुरंत कोर्ट में 'रिकवरी वारंट' जारी कराने की अर्जी देनी चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion)

भरण-पोषण का अधिकार किसी को परेशान करने का जरिया नहीं, बल्कि समाज के आश्रित और जरूरतमंद लोगों को आर्थिक तंगी से बचाने का एक मानवीय विधिक जरिया है। नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के कड़े नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी बेसहारा महिला, बच्चे या बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा न हो सके। यदि आपका हक छीना जा रहा है, तो घबराएं नहीं और सही कानूनी रास्ता अपनाएं। यदि आपको यह कानूनी मार्गदर्शिका सरल और उपयोगी लगी हो, तो इसे अपने मित्रों और विशेषकर जरूरतमंद लोगों के साथ व्हाट्सएप (WhatsApp) पर जरूर शेयर करें। अपने विचार या सवाल नीचे कमेंट बॉक्स में लिखना न भूलें।

चेतावनी (Legal Disclaimer) इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य कानूनी जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। इसे किसी भी प्रकार की व्यावसायिक या पेशेवर कानूनी सलाह (Professional Legal Advice) न समझें। भरण-पोषण के मामलों में हर व्यक्ति की आय और घरेलू परिस्थितियां पूरी तरह भिन्न होती हैं, इसलिए कोई भी कानूनी कार्रवाई शुरू करने से पहले किसी योग्य और पंजीकृत फैमिली लॉ वकील (Advocate) से व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें।

अक्सर पूछे जाने वाले कानूनी सवाल (Legal FAQs)

Q1. क्या कोई पढ़ी-लिखी महिला भी कोर्ट से भरण-पोषण (Maintenance) मांग सकती है?

Ans 1. हाँ, बिल्कुल। केवल पढ़ी-लिखी या डिग्री धारक होने से महिला का अधिकार खत्म नहीं होता। कोर्ट मुख्य रूप से यह देखता है कि क्या वर्तमान में महिला के पास आय का कोई वास्तविक साधन है या नहीं। यदि वह नौकरी नहीं कर रही है और खुद का खर्च उठाने में असमर्थ है, तो वह गुजारा भत्ता पा सकती है।

Q2. भरण-पोषण का केस दर्ज कराने के लिए कोर्ट की सरकारी फीस कितनी होती है?

Ans 2. आश्रितों और कमजोर वर्गों की सुविधा के लिए इस प्रकार के सामाजिक कल्याण से जुड़े मामलों में सरकारी कोर्ट फीस बहुत ही मामूली होती है (आमतौर पर विभिन्न राज्यों में 10 से 50 रुपये)। हालांकि, अपने निजी वकील की पैरवी की फीस आपको अलग से वहन करनी होती है।

Q3. यदि पति या बेटा कोर्ट के आदेश के बाद भी हर महीने गुजारा भत्ता न दे तो क्या सजा होगी?

Ans 3. यदि कोर्ट के आदेश के बावजूद जिम्मेदार व्यक्ति पैसे नहीं देता है, तो मजिस्ट्रेट उसके खिलाफ रिकवरी वारंट जारी कर सकते हैं। हर एक महीने के बकाया भरण-पोषण की राशि न चुकाने पर दोषी को अधिकतम 1 महीने तक की जेल की सजा दी जा सकती है, जब तक कि वह भुगतान न कर दे।

Q4. क्या नौकरीपेशा या कामकाजी पत्नी को भी पति से गुजारा भत्ता मिल सकता है?

Ans 4. यदि पत्नी अच्छी नौकरी में है और उसकी आय अपने खर्च उठाने के लिए पूरी तरह पर्याप्त है, तो सामान्यतः उसे भरण-पोषण नहीं मिलता। हालांकि, यदि पति की आय बहुत अधिक है और पत्नी की आय उसके मुकाबले बहुत कम है, तो जीवन स्तर की समानता (Standard of Living) बनाए रखने के लिए कोर्ट कुछ राशि मंजूर कर सकता है।

Q5. क्या बेटियां भी अपने बूढ़े माता-पिता को भरण-पोषण देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं?

Ans 5. हाँ, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों और सीनियर सिटीजन एक्ट के अनुसार, यदि माता-पिता अपना खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं, तो बेटों के साथ-साथ शादीशुदा या कमाऊ बेटियां भी अपने माता-पिता को भरण-पोषण देने के लिए बराबर की हकदार और कानूनी रूप से बाध्य हैं।

Q6. क्या कोई पति भी अपनी पत्नी से भरण-पोषण (Alimony) की मांग कर सकता है?

Ans 6. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 और 25 के तहत यह विशेष प्रावधान है कि यदि पति शारीरिक या मानसिक रूप से पूरी तरह लाचार/अपाहिज है और कमाने में असमर्थ है, जबकि पत्नी अच्छी नौकरी में है, तो पति भी कोर्ट के माध्यम से पत्नी से गुजारे भत्ते की मांग कर सकता है।

Q7. क्या अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) मिलने में सालों का समय लगता है?

Ans 7. नए BNSS कानून के तहत इस प्रक्रिया को तेज किया गया है। नियमों के अनुसार, विपक्षी को नोटिस तामील होने के 60 दिनों के भीतर मजिस्ट्रेट को अंतरिम भरण-पोषण के आवेदन पर अपना अंतरिम निर्णय सुनाना होता है ताकि पीड़ित को तुरंत आर्थिक सहायता मिल सके।

Q8. यदि भविष्य में पति की नौकरी चली जाए या आय कम हो जाए, तो क्या भरण-पोषण की राशि कम हो सकती है?

Ans 8. हाँ, कानून में बदलाव का प्रावधान है। यदि भविष्य में किसी भी पक्ष की आर्थिक स्थिति बदलती है (जैसे पति की नौकरी जाना या पत्नी को अच्छी नौकरी मिलना), तो प्रभावित पक्ष कोर्ट में अर्जी देकर भरण-पोषण की तय राशि को कम, ज्यादा या पूरी तरह से बंद कराने की मांग कर सकता है।

Q9. क्या लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) में रहने वाली महिला भी भरण-पोषण मांग सकती है?

Ans 9. सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न प्रगतिशील फैसलों के अनुसार, यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक एक ही छत के नीचे पति-पत्नी की तरह लिव-इन में रहे हैं, तो महिला को इस कानून के तहत सुरक्षा मिलती है और वह अलग होने पर अपने पुरुष पार्टनर से गुजारा भत्ता पाने की हकदार मानी जाती है।

Q10. अगर कोई पत्नी बिना किसी भेदभाव के आपसी सहमति से अलग रहने लगे, तो क्या वह खर्च मांग सकती है?

Ans 10. कानून के स्पष्ट नियमों के अनुसार, यदि पति-पत्नी आपसी रजामंदी से बिना किसी विवाद के पूरी तरह अलग रहने का फैसला करते हैं, या यदि पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ व्यभिचार (Adultery) में रह रही है, तो वह इस धारा के तहत पति से भरण-पोषण का दावा करने की अधिकारी नहीं रह जाती है।

About the author

Desh Raj
नमस्कार दोस्तों! मैं देश राज हूँ, देवभूमि हिमाचल प्रदेश (शिमला) का निवासी। आर्ट्स में मेरी ग्रेजुएशन (BA) और समाज को गहराई से देखने के मेरे नज़रिये ने मुझे एक आम नागरिक (Common Citizen) के अधिकारों और ज़रूरतों को समझने की प्रेरणा दी। इसी सोच के साथ …

Post a Comment

Common Citizen Nyay And Services (ccns.in) par aapka swagat hai. Kripya yahan par apna nishpaksh aur kanooni roop se sarthak vichar sajha karein. Kisi bhi vyakti, dharam ya samuday ke khilaf amaryadit ya gair-kanooni bhasha ka prayog na karein. Spam aur promotion wale comments remove kar diye jayenge.
​Dhanyawad!